Saturday, 15 August 2020

कोरोनाकालीन स्वाधीनता दिवस

 आज हमारा ७४वा स्वाधीनता दिवस है। सभी भारतवासियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण उत्सव है।अधिकतर लोग इस दिन अपनी देश भक्ति की भावना प्रदर्शित करने के लिए कुछ न कुछ विशिष्ट करते हैं।पूरा देश तिरंगे के रंग में रंगा नज़र आता है।हर जगह देशभक्ति के गाने गुंजायमान रहते हैं।

                  पर इस वर्ष कोरोना रूपी महामारी ने इस उत्सव के उत्साह को मद्धम कर दिया है।किसी भी प्रकार के सामुहिक आयोजन पर रोक होने की वजह से आमतौर पर होने वाली धूमधाम गुम है।सुबह से नहाधोकर, साफ सुथरे कपड़े पहने,हाथों में तिरंगा थामे बच्चों के झुंड घरों में उदास बैठे हैं।ये दिन तो विद्यालयों में विशेष होता था।सुंदर सजावट,झंडावंदन, रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, मिष्ठान्न वितरण और मित्रों के साथ मौज मस्ती।समय कब निकल जाता, पता ही नही चलता था।पर इस बार तो वैसे ही विद्यालय और शिक्षकों को देखे बहुत समय हो गया।और इस उत्सव ने इस कसक को और बढ़ा दिया है। 

बच्चे क्या बड़े भी उदास हैं।सरकारी अवकाश तो इस बार भी है,पर एक दूसरे को मिलकर बधाइयाँ देने का सिलसिला टूट चुका है।झंडावंदन करना,राष्ट्रगान गाना और  खड़े होकर तिरंगे को सम्मान देते समय ऐसा महसूस करना कि हम भी इस देश के सिपाही हैं,वो सब हृदय को साल रहा है।

                 महिलाएं भी उस उत्सवी माहौल को बहुत याद कर रही हैं। सुबह सुबह सबका जल्दी घर से निकलना,पर सबके लौटने तक कुछ विशेष व्यंजन बनाकर तैयार रखना।और फिर कहीँ बाहर जाकर छुट्टी का आनंद लेना।पर इस बार तो सब घर पर ही हैं,और इतनी लंबी छुट्टी में सब बना बनाकर और खिला खिलाकर अब कुछ विशेष बनाने का मन नहीं करता।बाहर कहीं जाने का तो सवाल ही नहीं उठता।

           वो झांकियाँ,परेड,जयकारे सभी कुछ गुम हैं।पर हमारा देशप्रेम इस दिखावे के ताम-झाम और शोर-शराबे पर आश्रित नही है। हमारी देशभक्ति वो भावना है ,जो हर भारतवासी के शरीर में रक्त की तरह बहती है।देश के प्रति सम्मान और अपमान करनेवालों के प्रति क्रोध स्वतः ही हमारे आचार विचार में समा गया है।

             हम अपने घरों में सुरक्षित ये राष्ट्रीय पर्व अपने अपने तरीकों से मना रहे हैं,इस आशा में कि हम इस महामारी से जल्द ही जीतेंगे और  नए उत्साह और उमंग के साथ फिर अपना तिरंगा फहराएंगे।।

।।जय हिंद।।

उत्सव स्वाधीनता का भले ही मद्धम है,

पर दिलों में,देशभक्ति की भावना,अब भी कायम है ।

जयकारों के उद्घोष ना सही, गर्दी,हलचल गायब है,

पर लहू में अब भी देश के लिए मिटने का जज्बा कायम है।।


                     

Tuesday, 11 August 2020

दया का सुपात्र

 आज कृष्ण जन्माष्टमी है और जहाँ कृष्ण हो वहाँ सुदामा का नाम ना आए ,ऐसा हो नहीं सकता। सुदामा पर कृष्ण ने करुणावश अथवा मित्रता के कारण दया नहीं दिखायी थी,वे इस दया के पात्र थे। उन्होंने तत्कालीन नियम-संयमों का पूरी श्रद्धा से पालन किया था।कभी लालच और मोह को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।यहां तक कि ,कृष्ण के प्रेमपूर्ण व्यवहार के बाद भी वे अपनी व्यथा-कथा उनसे नहीं कह पाये थे।ऐसे व्यक्ति निश्चित ही दया के सुपात्र होते हैं।

                          वर्तमान समय में, जब दया, परोपकार,ईमानदारी और सच्चाई न के बराबर रह गए हैं,तब दान-धर्म के लिए सुपात्र ढूढ़ना निश्चय ही जटिल काम है।वो भी तब जब अधिकतर लोग होते डाकू खड्गसिंह हैं और भेष दीनहीन का बनाकर घूमते हैं।हर किसी जरूरतमंद की मदद करने से पहले दस बार सोचना पड़ता है।

                             मैं अमूमन किसी की मदद के लिए मना नहीं करती,पर हाल ही कि घटना ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया।हुआ यूँ कि किसी काम से मेरा बैंक जाना हुआ। बैंक का काम निपटाकर जब बाहर निकली,तो पीछे से किसी बुजुर्ग महिला की आवाज़ आयी,"दीदी,मेरी मदद कर दो।"

ठिठटकर मैंने पीछे देखा,एक दुबली-पतली वृद्ध महिला,हाथ जोड़े खड़ी थी।मेरे देखते ही बोली,"मैं पेंशन के लिए आयी थी,पर बैंक वाले कह रहे हैं,अभी खाते में पैसे नहीं आये हैं।घर वापस जाने का किराया भी नहीं है।बीस रूपये दे दो,तो मैं घर चली जाऊँ।"

मैंने पूछा भी की, "अम्मा !इतनी कितनी दूर रहती हो?पेंशन का खाता तो पास के बैंक में ही देते हैं"।

अम्मा बोलीं,"पहले यहीं रहती थी,अब बड़े बेटे के पास चली गयी हूँ।वो दूर रहता है"।

कुछ सोचकर जैसे ही मैन पर्स खोला, पीछे से एक लड़का आया और अम्मा पर चिल्लाने लगा,"क्यों लोगों को बेवकूफ बना रही हो अम्मा?दो दिन पहले मंदिर के पास वाली बैंक में,तुमने मुझसे भी यही कहा था और मैंने तुम्हें पचास रूपये दिए थे। तुमने तो धंधा बना लिया है"।

मेरी तरफ मुड़कर बोला,"दीदी ,ये लोग विश्वास और दया के लायक नहीं है।चाहो तो बैंक की पासबुक मांग कर देख लो"।

सिटपिटाई अम्मा से जब मैंने पासबुक के बारे में पूछा तो घबराकर बोली," पासबुक तो बैंक के बाबू ने अपने पास रख ली है। कहा अगली बार आओ तो पेंशन के साथ ले जाना।दीदी,तुम भी कहाँ, ऐसे फालतू लड़के की बात पे ध्यान देती हो।अच्छा बीस नहीं, तो दस रुपये ही दे जाओ"।

माजरा समझते ही मैंने पर्स बंद किया,और वहाँ से निकल ली। पीछे से उस दीनहीन अम्मा की गुस्से में कोसने कि आवाज़ें आ रही थीं।तब से पता नहीं क्यों,किसी की भी यूँ ही मदद करने की हिम्मत नहीं होती।

शायद समय की यही मांग है कि दया भी सुपात्र पर ही दिखायी जाए।वरना दयालु की जगह बेवकूफ का तमगा लग जायेगा। हमारे पुराणों में भी कहा गया है कि दान का पुण्य भी तब ही मिलता है,जब वो किसी सुपात्र को किया जाए।

।।जय श्री कृष्ण।।

Monday, 10 August 2020

माँ सिर्फ माँ नहीं होती

 हाल ही में मानव कंप्यूटर शकुंतला देवी पर आधारित फिल्म देखी।फ़िल्म देखकर मुख्यतः दो बातें मानस पटल पर छा गईं।पहली तो यह कि आखिर वो इतनी आसानी से इतनी जटिल गणनाएं कैसे कर लेती थीं ?लगता है जैसे कोई विलक्षण मानसिक शक्ति थी उनके पास।अद्भुत और अभूतपूर्व प्रतिभा।।

                                     दूसरी बात थी माँ-बेटी का रिश्ता।वास्तविक जीवन में दोनो एक दूसरे की पूरक होती हैं।माँ के लिए बेटी और बेटी के लिए माँ आदर्श होती है। जहाँ माँ कोशिश करती है कि बेटी को उसके कड़वे अनुभव न सहन करना पड़े, वहीं बेटी जीवन में सब कुछ अपने अनुभव से सीखना चाहती है। फ़िल्म में माँ बेटी के बीच के टकराव को तीन पीढ़ियों के बीच दर्शाया गया है जिसके केंद्र में स्वयं शकुंतला देवी हैं। उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपनी माँ से नफरत की,पर अपनी बेटी से उलझते रिश्ते ,सुलझाते वक्त उन्हें समझ आया कि वो सिर्फ उन्हें माँ की नज़रों से देखती रहीं।उन्होंने कभी अपनी माँ को एक औरत की नज़र से नही देखा।क्योंकि एक माँ की दुनिया तो सीर्फ़ उसकी संतान होती है परंतु औरत को तो पूरी दुनिया की परवाह करनी होती है। वह पत्नी भी होती है और दुनियादारी ,सामाजिक प्रथाएं निभाने वाली गृहणी भी। वह ममतामयी माँ भी होती है और अपनी इच्छाओं,महत्वकांक्षाओं को जीने वाली औरत भी।

                         हमारे साथ भी यही होता है। जब हम बेटियां होती हैं, तब माँ से अनबन बनी रहती है कि वह हमें और हमारी भावनाओं को नही समझती।परंतु जब हमारी बेटियां भी हमसे यही शिकायत करती है,तब यह प्रश्न मन में उठता है कि कहाँ गल्ती हो गयी। हमने तो बच्चों के लिए सब कुछ किया,अपने सपनों और  अरमानों को भी त्याग दिया,फिर भी वही सवाल,वही असंतुष्टि।तब अपनी माँ की व्यथा समझ आती है कि एक माँ कभी गलत नहीं हो सकती ।तब समझ आता है कि माँ-बेटी  का रिश्ता ही ऐसा होता है कि एक दूसरे की परछाई होते हुए भी एक दूसरे से दूर भागती हैं। और जब दूर हो जाती हैं तब सबसे ज्यादा बैचैन भी होती हैं मिलने के लिये।

                इसलिये अगर किसी के भी मन में अपनी माँ के लिए अगर कोई शिकायत है तो अपनी संतान से अपने रिश्तों के बारे में सोचिये,सारे जवाब मिल जाएंगे।माँ यूँ ही माँ नहीं होती।।