Tuesday, 11 August 2020

दया का सुपात्र

 आज कृष्ण जन्माष्टमी है और जहाँ कृष्ण हो वहाँ सुदामा का नाम ना आए ,ऐसा हो नहीं सकता। सुदामा पर कृष्ण ने करुणावश अथवा मित्रता के कारण दया नहीं दिखायी थी,वे इस दया के पात्र थे। उन्होंने तत्कालीन नियम-संयमों का पूरी श्रद्धा से पालन किया था।कभी लालच और मोह को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।यहां तक कि ,कृष्ण के प्रेमपूर्ण व्यवहार के बाद भी वे अपनी व्यथा-कथा उनसे नहीं कह पाये थे।ऐसे व्यक्ति निश्चित ही दया के सुपात्र होते हैं।

                          वर्तमान समय में, जब दया, परोपकार,ईमानदारी और सच्चाई न के बराबर रह गए हैं,तब दान-धर्म के लिए सुपात्र ढूढ़ना निश्चय ही जटिल काम है।वो भी तब जब अधिकतर लोग होते डाकू खड्गसिंह हैं और भेष दीनहीन का बनाकर घूमते हैं।हर किसी जरूरतमंद की मदद करने से पहले दस बार सोचना पड़ता है।

                             मैं अमूमन किसी की मदद के लिए मना नहीं करती,पर हाल ही कि घटना ने मुझे भी सोचने पर मजबूर कर दिया।हुआ यूँ कि किसी काम से मेरा बैंक जाना हुआ। बैंक का काम निपटाकर जब बाहर निकली,तो पीछे से किसी बुजुर्ग महिला की आवाज़ आयी,"दीदी,मेरी मदद कर दो।"

ठिठटकर मैंने पीछे देखा,एक दुबली-पतली वृद्ध महिला,हाथ जोड़े खड़ी थी।मेरे देखते ही बोली,"मैं पेंशन के लिए आयी थी,पर बैंक वाले कह रहे हैं,अभी खाते में पैसे नहीं आये हैं।घर वापस जाने का किराया भी नहीं है।बीस रूपये दे दो,तो मैं घर चली जाऊँ।"

मैंने पूछा भी की, "अम्मा !इतनी कितनी दूर रहती हो?पेंशन का खाता तो पास के बैंक में ही देते हैं"।

अम्मा बोलीं,"पहले यहीं रहती थी,अब बड़े बेटे के पास चली गयी हूँ।वो दूर रहता है"।

कुछ सोचकर जैसे ही मैन पर्स खोला, पीछे से एक लड़का आया और अम्मा पर चिल्लाने लगा,"क्यों लोगों को बेवकूफ बना रही हो अम्मा?दो दिन पहले मंदिर के पास वाली बैंक में,तुमने मुझसे भी यही कहा था और मैंने तुम्हें पचास रूपये दिए थे। तुमने तो धंधा बना लिया है"।

मेरी तरफ मुड़कर बोला,"दीदी ,ये लोग विश्वास और दया के लायक नहीं है।चाहो तो बैंक की पासबुक मांग कर देख लो"।

सिटपिटाई अम्मा से जब मैंने पासबुक के बारे में पूछा तो घबराकर बोली," पासबुक तो बैंक के बाबू ने अपने पास रख ली है। कहा अगली बार आओ तो पेंशन के साथ ले जाना।दीदी,तुम भी कहाँ, ऐसे फालतू लड़के की बात पे ध्यान देती हो।अच्छा बीस नहीं, तो दस रुपये ही दे जाओ"।

माजरा समझते ही मैंने पर्स बंद किया,और वहाँ से निकल ली। पीछे से उस दीनहीन अम्मा की गुस्से में कोसने कि आवाज़ें आ रही थीं।तब से पता नहीं क्यों,किसी की भी यूँ ही मदद करने की हिम्मत नहीं होती।

शायद समय की यही मांग है कि दया भी सुपात्र पर ही दिखायी जाए।वरना दयालु की जगह बेवकूफ का तमगा लग जायेगा। हमारे पुराणों में भी कहा गया है कि दान का पुण्य भी तब ही मिलता है,जब वो किसी सुपात्र को किया जाए।

।।जय श्री कृष्ण।।

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