Monday, 10 August 2020

माँ सिर्फ माँ नहीं होती

 हाल ही में मानव कंप्यूटर शकुंतला देवी पर आधारित फिल्म देखी।फ़िल्म देखकर मुख्यतः दो बातें मानस पटल पर छा गईं।पहली तो यह कि आखिर वो इतनी आसानी से इतनी जटिल गणनाएं कैसे कर लेती थीं ?लगता है जैसे कोई विलक्षण मानसिक शक्ति थी उनके पास।अद्भुत और अभूतपूर्व प्रतिभा।।

                                     दूसरी बात थी माँ-बेटी का रिश्ता।वास्तविक जीवन में दोनो एक दूसरे की पूरक होती हैं।माँ के लिए बेटी और बेटी के लिए माँ आदर्श होती है। जहाँ माँ कोशिश करती है कि बेटी को उसके कड़वे अनुभव न सहन करना पड़े, वहीं बेटी जीवन में सब कुछ अपने अनुभव से सीखना चाहती है। फ़िल्म में माँ बेटी के बीच के टकराव को तीन पीढ़ियों के बीच दर्शाया गया है जिसके केंद्र में स्वयं शकुंतला देवी हैं। उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपनी माँ से नफरत की,पर अपनी बेटी से उलझते रिश्ते ,सुलझाते वक्त उन्हें समझ आया कि वो सिर्फ उन्हें माँ की नज़रों से देखती रहीं।उन्होंने कभी अपनी माँ को एक औरत की नज़र से नही देखा।क्योंकि एक माँ की दुनिया तो सीर्फ़ उसकी संतान होती है परंतु औरत को तो पूरी दुनिया की परवाह करनी होती है। वह पत्नी भी होती है और दुनियादारी ,सामाजिक प्रथाएं निभाने वाली गृहणी भी। वह ममतामयी माँ भी होती है और अपनी इच्छाओं,महत्वकांक्षाओं को जीने वाली औरत भी।

                         हमारे साथ भी यही होता है। जब हम बेटियां होती हैं, तब माँ से अनबन बनी रहती है कि वह हमें और हमारी भावनाओं को नही समझती।परंतु जब हमारी बेटियां भी हमसे यही शिकायत करती है,तब यह प्रश्न मन में उठता है कि कहाँ गल्ती हो गयी। हमने तो बच्चों के लिए सब कुछ किया,अपने सपनों और  अरमानों को भी त्याग दिया,फिर भी वही सवाल,वही असंतुष्टि।तब अपनी माँ की व्यथा समझ आती है कि एक माँ कभी गलत नहीं हो सकती ।तब समझ आता है कि माँ-बेटी  का रिश्ता ही ऐसा होता है कि एक दूसरे की परछाई होते हुए भी एक दूसरे से दूर भागती हैं। और जब दूर हो जाती हैं तब सबसे ज्यादा बैचैन भी होती हैं मिलने के लिये।

                इसलिये अगर किसी के भी मन में अपनी माँ के लिए अगर कोई शिकायत है तो अपनी संतान से अपने रिश्तों के बारे में सोचिये,सारे जवाब मिल जाएंगे।माँ यूँ ही माँ नहीं होती।।

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