उड़ान
चाह थी ये कबसे ,कि नापूं आसमां को ,
होंसलों के परों से ,छू लूं ऊंचाइयों को ,
मालूम थी न मंज़िल ,ना दम का ही पता था ,
ख्वाहिशों में दबके ,खोया ये खयाल था।
उड़ते परिंदो ने मुझको ,एहसास ये कराया है,
आसमान मेरे हिस्से का ,और उड़ान अभी बकाया है ,
होंसलों की साँसे और क्षितिज अभी बाकी है ,
तूफानों संभल जाओ ,मेरी उड़ान अभी बाकी है।
ख्वाहिशों में दबके ,खोया ये खयाल था।
उड़ते परिंदो ने मुझको ,एहसास ये कराया है,
आसमान मेरे हिस्से का ,और उड़ान अभी बकाया है ,
होंसलों की साँसे और क्षितिज अभी बाकी है ,
तूफानों संभल जाओ ,मेरी उड़ान अभी बाकी है।
No comments:
Post a Comment